
अब मैं बूढ़ा हो गया हूं। आज ईद है।जीवन में बहुत सी ईदें आईं और चली गई। बचपन की ईद भी थी जब मैं बहुत छोटा था। माता-पिता जीवित थे ।भाई भी छोटे-छोटे से थे ।उनके साथ ईदगाह की नमाज पढ़ने जाते थे। गांव में अपने गांव में था । मूह दर समूह लोग सभी के घरों में सेवइयां खाने जाते थे। हम लोग भी अपने नए कपड़ों के साथ एक समूह में इकट्ठा होकर हर घर में जाते थे। हम लोगों को अलग से सेवइयां मिलती थी। क्या दिन थे आज क्या दिन है। जब मैं बूढ़ा हो गया हूं बच्चे जवान हैं। अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं। और ईद मना रहे हैं। आज वह हमारे साथ नहीं है। जीवनसाथी भी अब जीवित नहीं है। मैं अकेला हूं बेटियां बड़ी हो गई है। अपने घरों की ज़ीनत बन गई है,और अपने परिवार के साथ खुश हैं। बेटे बड़े होकर अपने बच्चों के साथ खुश हैं। आज हमें अपने मां-बाप याद आते हैं।जब हम जवान थे तो अपने बच्चों के साथ ईद मनाया करते थे। अपने छोटे बच्चों के लिए कपड़ों और सेवाइयों की व्यवस्था में लगे रहते थे। जिस हाल में भी थे खुश थे। मगर आज ऐसा लगता है की जीवन का अंत है। खुशियां तो दूर रही अपनों का भी साथ छूट गया। इस बार की ईद में मौसम भी खराब है ईदगाह या मस्जिद तक जाने की हिम्मत नहीं है। जब अपनों का साथ होता है तो हिम्मत बढ़ जाती है। मगर किस्मत और खुशियां जिस हाल में मिले।स्वीकार करना चाहिए। सभी लोगों को, नौजवान, बच्चों और नन्हे मुन्ने प्यारे-प्यारे नौनिहालों को ढेर सारा प्यार और बधाई।
